हिंदी के एक बड़ा अखबार का करतूत

हाथरस कांड में युवती ने मरते हुए बलात्कारियों का नाम लिया, लेकिन हिंदी का एक बड़ा अख़बार कह रहा है कि उसकी मां ने ही उसे मार दिया। इतनी धूर्तता, इतनी जातिवादी मानसिकता लेकर पत्रकारिता हो रही है……
इतनी घिनौनी पत्रकारिता होगी तो जनमानस का विश्वास क्या चौथा स्तम्भ पर होगा ?
लोगों को लगता है कि इस देश में गरीब, मजलूमों की आवाज़ उठाने वाला मीडिया है।
आरोपियों के बयान को तथ्य की तरह प्रस्तुत किया जाना, आखिर यह किस तरह की पत्रकारिता है ?